मनुस्मृति और भारत का संविधान
अध्याय - 5 क
भारत के संविधान की प्रस्तावना और मनुस्मृति
डॉ राकेश कुमार आर्य
भारत गणराज्य के संविधान की प्रस्तावना को भारतीय संविधान की ' कुंजी' कहा जाता है। किसी भी संविधान की प्रस्तावना उसकी पथप्रदर्शिका होती है। उसकी दिग्दर्शिका होती है। यह उसी प्रकार है जिस प्रकार किसी पुस्तक की प्रस्तावना पुस्तक के प्रतिपाद्य विषय को पाठक के मन मस्तिष्क में पहले ही स्थापित कर देती है। वह यह समझ जाता है कि इस पुस्तक के माध्यम से लेखक क्या संदेश देना चाहता है अथवा इस पुस्तक को लिखने का लेखक का उद्देश्य क्या है ?
प्रस्तावना का आदर्श और संविधानसभा
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि इसके माध्यम से संपूर्ण संविधान को समझने में सहायता मिलनी चाहिए। इसलिए प्रस्तावना के एक-एक शब्द को बहुत सावधानी से चुना गया है। निश्चित रूप से प्रस्तावना में जिन शब्दों का प्रयोग किया गया है, वे बहुत ही सुंदर शब्द हैं। चुने हुए शब्दों में गुंथे हुए भावों को प्रकट किया गया है। ये शब्द न केवल किसी सुंदर व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं, अपितु हमारी संविधान निर्मात्री सभा के सदस्यों के मानसिक आभामंडल को प्रकट करने के साथ-साथ भारत के उज्ज्वल भविष्य की ओर भी संकेत करते हैं। एक ऐसी व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं जो सबसे उत्तम, सबसे निराली और सबसे अनोखी हो। यह अलग बात है कि उस सुंदर व्यवस्था को स्थापित किस प्रकार किया जाएगा, इस पर हमारा संविधान पूर्णतया मौन है ?
अपनी सुंदर व्यवस्था को कार्य रूप देने के लिए मानव को मानव से देव बनाने की मनुस्मृति द्वारा प्रतिपादित किसी समकक्ष व्यवस्था को इस संविधान में स्थान नहीं दिया गया है, अर्थात देश के नागरिकों का सामाजिक चरित्र कैसा होगा ? राष्ट्रीय चरित्र कैसा होगा ? वे मानसिक आत्मिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक उन्नति कैसे कर पाएंगे ? किस प्रकार वे अपने जीवन में मोक्ष प्राप्त करने के लिए सांसारिक विषय वासनाओं और दुर्व्यसनों से अपने आप को बचा पाएंगे ? इस पर कोई चिंतन संविधान में नहीं है। यहां तक की कोई ऐसी पंक्ति भी सांकेतिक रूप से नहीं दी गई है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि संविधान भारत के उन आदर्शों के प्रति अपने आप को समर्पित करता है जिन्हें वैदिक जीवन मूल्यों , वैदिक सिद्धांतों या वैदिक मान्यताओं के रूप में मान्यता प्राप्त है।
नेहरू जी के उद्देश्य प्रस्ताव
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को देश की संविधान सभा के समक्ष कुछ उद्देश्य प्रस्ताव रखे थे। उन्हीं उद्देश्य प्रस्तावों को लेकर भारतीय संविधान की प्रस्तावना को तैयार किया गया है। हम सभी जानते हैं कि पंडित जवाहरलाल नेहरू वेदों और भारतीय सांस्कृतिक गौरव के प्रति तिरस्कार का भाव रखते थे, उनके हृदय में भारत के प्राचीन गौरव के प्रति कोई सम्मान का भाव नहीं था। उनकी दृष्टि में मुगलों से पीछे के भारत की ओर देखना और इस पर अनुसंधान करना समय को नष्ट करने के समान था। इसलिए उनके उद्देश्य प्रस्तावों में भारत के प्राचीन गौरव पर भी प्रकाश डाला जाएगा, ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। न ही यह माना जा सकता था कि वह अपने उद्देश्य प्रस्तावों में भारत के वैदिक अतीत के गौरवपूर्ण संस्मरणों को पिरोकर उन्हें वर्तमान संविधान के लिए प्रेरक तत्व के रूप में प्रस्तुत करेंगे। नेहरू जी ने भारतीय सांस्कृतिक वैभव और वांग्मय के प्रति सदा तिरस्कार भाव प्रकट किया था। वह वेदों की मानवीय संस्कृति को भी सांप्रदायिक संस्कृति मानते थे। कदाचित इसीलिए उन्होंने भारतीय संविधान को धर्मनिरपेक्ष बनाने का प्रयास किया। अपनी शक्ति का प्रयोग उन्होंने इसी दिशा में किया कि किसी भी मूल्य पर भारत को भारत की वैदिक संस्कृति के प्रति झुकने न दिया जाए। जबकि कथित मुस्लिम संस्कृति के प्रति उनके हृदय में उतना ही उदार भाव था।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि प्रस्तावना भारतीय संविधान का एक अंग नहीं है, परंतु इसका महत्व बहुत अधिक है। इसके महत्व को समझ कर ही संविधान सभा द्वारा 22 जनवरी 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू के उद्देश्य प्रस्तावों को स्वीकार किया गया। संविधान सभा ने नेहरू जी के उद्देश्य प्रस्तावों में संविधान की अंतर्निहित भावना के दर्शन किये। यही कारण रहा कि 26 नवंबर 1949 को जब हमारा संविधान बनकर तैयार हुआ तो नेहरू जी के इन्हीं उद्देश्य प्रस्तावों को प्रस्तावना के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई। यहां पर यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि नेहरू जी किसी न किसी प्रकार अपनी बात को " ऐतिहासिक संस्मरण " के रूप में कहीं ना कहीं स्थापित करवाने के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। उन्होंने संविधान को 26 जनवरी 1950 से इसलिए लागू करवाया था कि इसके बहाने उनके नेतृत्व में घटित उस घटना को याद किया जाता रहेगा, जब उन्होंने 26 जनवरी 1930 को पहली बार स्वाधीनता दिवस मनाया था।
भारत के संविधान की प्रस्तावना इस प्रकार है:-
" हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा
इसके सभी नागरिकों को
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता;
प्रतिष्ठा और अवसर की समानता;
प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए
दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस
संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवंबर, 1949 ( मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत 2006 विक्रमी ) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मपित करते हैं।"
(लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)
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