जीवन के अंधकार से परम प्रकाश है दस दैवीय शक्तियाँ
सत्येन्द्र कुमार पाठक
प्रस्तावना: शक्ति की अनंत यात्रा भारतीय मनीषा और तंत्र शास्त्र के गहन अरण्य में 'दस महाविद्या' वह सर्वोच्च शिखर हैं, जहाँ पहुँचकर साधक का भौतिक और आध्यात्मिक भेद समाप्त हो जाता है। वर्तमान का युग तीव्र प्रतिस्पर्धा, मानसिक अशांति और अनिश्चितता का युग है। ऐसे समय में, महाविद्याओं की साधना और दीक्षा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन का एक सूक्ष्म विज्ञान बनकर उभरी है। शास्त्रों में वर्णित है कि लाखों में कोई एक ही ऐसा सौभाग्यशाली होता है जिसे सद्गुरु के माध्यम से इन महाविद्याओं की दीक्षा प्राप्त होती है, जो उसके लिए सिद्धियों और शांति के द्वार खोल देती है। दस महाविद्याएँ में काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला—आद्याशक्ति के ही विभिन्न आयाम हैं। जहाँ एक ओर महाकाली काल का ग्रास करने वाली संहारक शक्ति हैं, वहीं कमला धन और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री हैं। महाकाली को दसों महाविद्याओं में प्रथम और सबसे प्रभावशाली माना गया है। कालिका पुराण के अनुसार, इनका शस्त्र त्रिशूल और तलवार है। शुक्रवार और अमावस्या की तिथि इनकी साधना के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। आज के युग में शत्रु केवल रक्त-मांस के इंसान नहीं हैं; 'रोग, शोक, व्याधि और मानसिक पीड़ा' भी मनुष्य के प्रबल शत्रु हैं। महाकाली की दीक्षा साधक को एक सुरक्षा कवच प्रदान करती है। यह वही शक्ति है जिसने कालिदास जैसे जड़ बुद्धि व्यक्ति के भीतर ज्ञान का स्रोत प्रवाहित किया, जिससे उन्होंने ‘मेघदूत’ और ‘ऋतुसंहार’ जैसे कालजयी महाकाव्यों की रचना की। इनके चार प्रमुख रूप—दक्षिणा काली, शमशान काली, मातृ काली और महाकाली—जीवन के विभिन्न संघर्षों को समाप्त करने वाले हैं।
तारा महाविद्या के तीन स्वरूप हैं—तारा, एकजटा और नील सरस्वती। प्राचीन काल से ही तारा साधना 'अक्षय धन' की प्राप्ति के लिए विख्यात रही है। ऐसी मान्यता है कि भगवती तारा अपने सिद्ध साधक को स्वर्ण और ज्ञान दोनों से परिपूर्ण कर देती हैं। आर्थिक मंदी और ऋण के बोझ से दबे आधुनिक मानव के लिए तारा दीक्षा न केवल आकस्मिक धन के द्वार खोलती है, बल्कि उसके भीतर भविष्य को देखने की दिव्य दृष्टि (Intuition) भी विकसित करती है।
त्रिपुर सुंदरी को 'षोडशी' भी कहा जाता है। यह शरीर की तीन प्रमुख नाड़ियों—इडा, सुषुम्ना और पिंगला को जाग्रत करती हैं। गृहस्थ सुख और अनुकूल विवाह की इच्छा रखने वालों के लिए यह साधना अद्वितीय है। वहीं, भुवनेश्वरी का अर्थ है 'संसार की स्वामिनी'। इनका बीज मंत्र ‘ह्रीं’ संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना का आधार है। जिस साधक की वाणी में सरस्वती का वास हो और जो कुबेर जैसी समृद्धि चाहता हो, उसके लिए भुवनेश्वरी साधना ही मार्ग है।
भगवती छिन्नमस्ता का स्वरूप भले ही भयावह प्रतीत हो, लेकिन यह उच्च कोटि के योगियों की देवी हैं। यदि किसी पर किया-कराया या तंत्र प्रयोग हो, तो छिन्नमस्ता दीक्षा उसे तत्काल सुरक्षा प्रदान करती है। इसी प्रकार, त्रिपुर भैरवी साधक को भूत-प्रेत और अदृश्य बाधाओं से मुक्त करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर सभ्य समाज तक, जहाँ भी अज्ञात भय का साया हो, वहाँ भैरवी की शक्ति अभय प्रदान करती है। इन शक्तियों का प्रभाव केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की भूमि पर स्थित इनके ऐतिहासिक मंदिर इसके जीवंत प्रमाण हैं:
कामाख्या (असम): यह तंत्र का 'महातीर्थ' है। यहाँ दसों महाविद्याओं के विग्रह मौजूद हैं। अंबुवाची मेले के दौरान यहाँ की ऊर्जा चरम पर होती है। कालीघाट और तारापीठ (बंगाल): ये स्थान काली और तारा की जाग्रत पीठें हैं, जहाँ सदियों से साधकों ने अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण की हैं। गढ़कालिका (उज्जैन): सम्राट हर्षवर्धन द्वारा जीर्णोद्धार कराया गया यह मंदिर आज भी विद्वत्ता और वाक-सिद्धि का केंद्र है। नलखेड़ा (मप्र) और बनखंडी (हिमाचल): ये दोनों स्थान बगलामुखी साधना के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं, जहाँ राजनेता और योद्धा विजय की कामना से आते हैं।
आज का मनुष्य 'मशीनी' हो गया है। जीवन नीरस है। ऐसे में मातंगी महाविद्या की दीक्षा जीवन में आकर्षण, कला और सम्मोहन का संचार करती है। वहीं, धूमावती साधना उन लोगों के लिए वरदान है जो अवसाद (Depression) और निरंतर बीमारी से घिरे हैं। धूमावती ही वह शक्ति हैं जो अभावों के बीच भी व्यक्ति को निडर और अडिग रहना सिखाती हैं। अंत में, कमला महाविद्या साधना आती है, जो दरिद्रता को समूल नष्ट कर साधक को आरोग्य, विजय और प्रतिष्ठा प्रदान करती है। अंधविश्वास नहीं, एक वैज्ञानिक संस्कार में समझना आवश्यक है कि दीक्षा कोई जादू या मदारी का खेल नहीं है। यह 'चित्त की शुद्धि' की एक प्रक्रिया है। गुरु द्वारा दी गई दीक्षा साधक की पशुवृत्तियों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) का शमन करती है। जब व्यक्ति का मन दर्पण की तरह साफ हो जाता है, तब उसे इन महाविद्याओं की शक्तियों का साक्षात्कार होता है।
कालिका पुराण , तंत्र शास्त्र , तंत्रसार और सिद्ध ग्रंथों , देवीभागवत के अनुसार महाविद्या साधना कोई खिलौना नहीं है। इसके लिए सात्विकता, ब्रह्मचर्य और नियम-संयम अनिवार्य हैं। मंत्रों का जाप जैसे—बगलामुखी के लिए हल्दी की माला या महाकाली के लिए हकीक की माला—विशेष वैज्ञानिक प्रभाव पैदा करती हैं। इसलिए, किसी जानकार या सिद्ध गुरु के बिना इन साधनाओं में प्रवृत्त होना जोखिम भरा हो सकता है।: पूर्णता की ओर कदम दस महाविद्याएँ जीवन के दस दिशाओं और दस आयामों का प्रतिनिधित्व करती हैं। चाहे वह शत्रु बाधा हो, आर्थिक तंगी हो, या मोक्ष की तीव्र इच्छा—इन शक्तियों की शरण में जाने पर साधक कभी रिक्त हस्त नहीं लौटता। जिस प्रकार एक बीज उपजाऊ भूमि में जाकर वटवृक्ष बनता है, उसी प्रकार श्रद्धा भाव से ली गई महाविद्या दीक्षा मनुष्य को 'साधारण' से 'सिद्ध' बना देती है। आज के अशांत समय में, जब व्यक्ति बाहरी दुनिया में शांति खोज रहा है, महाविद्याओं का यह प्राचीन मार्ग उसे अपने भीतर झाँकने और अपनी छिपी हुई अनंत शक्तियों को पहचानने का निमंत्रण देता है।
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