लोरी का महासफर: मिट्टी से माँ की ममता और लोक-गाथाओं तक
सत्येन्द्र कुमार पाठक
प्मानव सभ्यता के इतिहास में संगीत और संवेदना का सबसे प्राचीन संगम 'लोरी' है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि वह पहला संवाद है जो एक माँ अपनी संतान के साथ स्थापित करती है। लोरी का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी कि खुद मानवता। बेबीलोन की प्राचीन सभ्यता से शुरू होकर भारत के वैदिक गलियारों और मध्यकालीन वीर गाथाओं तक, लोरी ने संस्कृति, अनुशासन, भय और प्रेम के कई रंग समेटे हैं। बेबीलोन की मिट्टी और ४००० साल पुराना इतिहास में लोरी के लिखित इतिहास की शुरुआत आज के इराक (प्राचीन बेबीलोन) से होती है। पुरातत्वविदों को खुदाई के दौरान मिट्टी की छोटी-छोटी पट्टिकाएं मिली हैं, जो लगभग २००० ईसा पूर्व की हैं। दुनिया की ये सबसे पुरानी लोरियां आज की तरह केवल मधुर नहीं थीं। क्यूनीफॉर्म लिपि में लिखी इन पट्टिकाओं में बच्चे को सुलाने के लिए देवताओं के डर और 'बुरी आत्माओं' का उल्लेख किया गया था। उस समय माना जाता था कि यदि बच्चा रोएगा, तो घर के देवता या रक्षक रुष्ट हो जाएंगे, जिससे परिवार पर विपत्ति आ सकती है। अतः, लोरी का प्रारंभिक स्वरूप बच्चे को शांत रखने और अनुशासित करने का एक तरीका था। भारतीय संस्कृति में लोरी: वैदिक काल से आधुनिकता तक भारत में लोरी की परंपरा उतनी ही प्राचीन है जितने हमारे वेद। भारतीय परिवेश में लोरी ने समय के साथ कई रूप बदले हैं: : वेदों में भी संतान की रक्षा और शांति के लिए मंत्रों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें लोरी का आध्यात्मिक रूप माना जा सकता है। बाद में, यह परंपरा लोक-साहित्य और शास्त्रीय साहित्य का हिस्सा बनी।
: महाकवि सूरदास ने जब बाल-कृष्ण के लिए यशोदा के मुख से लोरियाँ कहलवाईं, तो उन्होंने 'वात्सल्य रस' को एक नई ऊंचाई दी। "यसोदा हरि पालने झुलावै" जैसे पद आज भी भारतीय घरों में आदर्श लोरी माने जाते हैं। यहाँ लोरी केवल सुलाने का माध्यम नहीं, बल्कि ईश्वर और भक्त के बीच के प्रेम का प्रतीक बन गई।'लोरी' शब्द अपने आप में एक वैश्विक पहचान रखता है। इसके अर्थ और संदर्भ अलग-अलग संस्कृतियों में अलग-अलग मिलते हैं:। 'लोरी' अर्मेनिया के एक ऐतिहासिक प्रांत का नाम है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। वेल्श प्रतीकवाद में वेल्श भाषा में 'लोरी' का अर्थ शक्ति, विजय और सम्मान से जुड़ा है। यह दर्शाता है कि यह शब्द केवल कोमलता का ही नहीं, बल्कि सामर्थ्य का भी सूचक है। विद्वानों का मानना है कि 'लोरी' शब्द की उत्पत्ति 'लुल' या 'लल्लबाय' के ध्वन्यात्मक प्रभाव से हुई है, जो बच्चे को थपकियाँ देते समय निकलने वाली आवाज़ से प्रेरित है। वीरता की लोरी में भारतीय लोक-परंपरा में 'लोरी' का सबसे अनूठा संदर्भ 'वीर लोरिक' की गाथा से मिलता है। मध्य भारत और उत्तर प्रदेश-बिहार के क्षेत्रों में 'लोरिकायन' अत्यंत प्रसिद्ध है। वीरता का संचार में लोरी केवल नींद लाने के लिए नहीं, बल्कि बच्चे के चरित्र निर्माण के लिए गाई जाती थी। वीर लोरिक की वीरता, उनके युद्धों और उनके साहस की कहानियाँ सुनाकर माँ अपने बच्चे को भविष्य का योद्धा बनाने का स्वप्न देखती थी। यह इस बात का प्रमाण है कि लोरी का उद्देश्य केवल 'सुलाना' नहीं, बल्कि 'जगाना' (चेतना को जगाना) भीरहा है।
भारत के विशाल भूगोल में लोरी के सुर बदलते रहते हैं । बंगाल में 'बर्गी' के इतिहास से जुड़ी लोरियाँ प्रसिद्ध हैं, जो बेबीलोन की तरह ही बाहरी खतरों से सुरक्षा का संदेश देती थीं। केरल की 'ओमानतिंगल किडावो' जैसी लोरियों में बच्चे की तुलना कमल, शहद और चांदनी से की जाती है, जो अत्यंत सौम्य और प्रकृति-प्रधान हैं। महाराष्ट्र: जीजाबाई द्वारा शिवाजी को सुनाई जाने वाली लोरियाँ राष्ट्रभक्ति और स्वराज की नींव रखती थीं। लोरी का आधुनिक विज्ञान भी अब मानता है कि लोरी बच्चे के मानसिक विकास के लिए अनिवार्य है।: माँ की आवाज़ की लय बच्चे के हृदय की धड़कन को नियंत्रित करती है और उसे सुरक्षा का अहसास दिलाती है। लोरी बच्चे द्वारा सुनी जाने वाली पहली 'कविता' या 'कहानी' होती है, जो उसके भाषाई ज्ञान की नींव रखती है।: लयबद्ध संगीत न केवल बच्चे को, बल्कि उसे गा रही माँ को भी मानसिक तनाव से मुक्ति देता है।बेबीलोन की उन मिट्टी की पट्टिकाओं से लेकर आज के डिजिटल युग के स्मार्ट पालनों तक, लोरी का सफर अटूट रहा है। यह भाषा, भूगोल और इतिहास की सीमाओं को लांघकर हर युग में प्रासंगिक बनी रही है। चाहे वह देवताओं का डर हो, वीर लोरिक की गाथा हो, या चंदा मामा की मधुर कहानी—लोरी अंततः मनुष्य की उस आदिम वृत्ति का हिस्सा है, जो प्रेम और सुरक्षा की तलाश में संगीत का सहारा लेती है।लोरी का इतिहास असल में मानवता के क्रमिक विकास का इतिहास है, जिसमें एक पीढ़ी अपनी संस्कृति और संस्कारों की मशाल दूसरी पीढ़ी को नींद की झपकी के साथ सौंप देती है।
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