"अहंकार से आत्म-बोध की ओर"
पंकज शर्मा
अहंकार एक मिथ्या आवरण है, जो बाह्य जगत की प्रशंसा एवं प्रदर्शन की नींव पर खड़ा होता है। यह स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की निरंतर असुरक्षा से घिरा रहता है, जिसके कारण मनुष्य अपने दोषों को छिपाने के लिए हठ एवं दंभ का दुर्ग निर्मित कर लेता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, अहंकार आत्मा पर चढ़ी वह धूल है जो हमें वास्तविकता के दर्शन नहीं करने देती।
इसके विपरीत, आत्म-सम्मान अंतस की वह निर्मल ज्योति है, जो स्वयं की स्वीकार्यता से प्रज्ज्वलित होती है। दार्शनिक रूप से, जब हम अपनी अपूर्णताओं को स्वीकार कर उन्हें सुधारने हेतु सेतु बनाते हैं, तब हम उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। सच्चा आत्म-सम्मान दूसरों से तुलना करने के बजाय स्वयं के परिष्करण में विश्वास रखता है, जहाँ शांति एवं संतोष का वास होता है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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