शंकराचार्य विवाद
अ कीर्ति वर्द्धनजाने कितनी पीठ बन गयी, कितने मठ उपजाये,
हर मठ में शंकराचार्य, बड़े जतन बन कर धाये।
लोभ मोह अहंकार, गाड़ी घोड़ा सत्ता सिंहासन,
कुछ चेले चेली दाएँ बाएँ, इन्द्रासन पा इतरायें।
हुए समर्पित जो धर्म को, सिमटे अपने मठ में,
शास्त्रों का पठन पाठन, सृजन अपने मठ में।
ज्ञानियों के मौन से अक्सर, अज्ञानी उग जाते,
अधर्मी फल फूल रहे हैं, धर्म परायण मठ में।
चार धाम थे चार पीठ, चार ही शंकराचार्य,
प्रत्येक राज्य के चार धाम, उतने शंकराचार्य।
लोभ- मोह- प्रतिष्ठा का, ऐसा ज्वर चढ़ा है,
स्वयंभू भगवान हो गये, स्वयंभू शंकराचार्य।
गुस्सा जिनकी नाक चढ़ा, गुंडे चारों ओर,
सनातन की मर्यादा, संरक्षक कोई और।
कुर्सी खातिर लड़ रहे, कुत्ते बिल्ली भाँति,
त्याग दया ज्ञान से वंचित, संत हैं या और।
अ कीर्ति वर्द्धन
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