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धरने - प्रदर्शन और वंदे मातरम

वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?
अध्याय ११

धरने - प्रदर्शन और वंदे मातरम

डॉ राकेश कुमार आर्य


ब्रिटिश सरकार ' वंदे मातरम' से कितनी भयभीत हो गई थी ? इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने विद्यालयों में अध्ययनरत छोटे-छोटे विद्यार्थियों को भी ' वंदे मातरम' बोलने के ' अपराध' में दंडित करना आरंभ कर दिया था। बाद नवंबर १९०५ की है, जब बंगाल के रंगपुर के एक विद्यालय के विद्यार्थियों ने ' वंदे मातरम' बोला तो ब्रिटिश सरकार ने उन सभी २०० विद्यार्थियों पर पांच-पांच रुपए का अर्थ दंड लगा दिया था।
इस घटना से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ब्रिटिश सरकार के अनेक प्रकार के अत्याचारों को झेलने के लिए हमारे विद्यार्थी भी तैयार हो गए थे। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं थी कि ब्रिटिश सरकार उनके साथ किस प्रकार का व्यवहार करेगी ? उनके भीतर तो राष्ट्रवाद के शोले धधक रहे थे। अपनी प्यारी मातृभूमि बंगाल का उन्हें सांप्रदायिक आधार पर विभाजन किसी भी रूप में स्वीकार नहीं था। इसके लिए उन्हें यदि अपने - अपने बलिदान भी देने पढ़ते तो वह उसके लिए सहर्ष तैयार थे। ब्रिटिश सरकार ने न केवल वंदे मातरम गाने पर प्रतिबंध लगाया, अपितु इसका विरोध करने वाले नेताओं और नागरिकों को विभिन्न प्रकार के दंड दिए।


' फूट डालो और राज करो' की ब्रिटिश नीति और ' वंदे मातरम'


हमें इस बात को बार-बार सुनाया पढ़ाया जाता रहा है कि अंग्रेज सरकार भारत के बारे में ' फूट डालो और राज करो' की नीति अपना रही थी। परंतु कभी यह नहीं बताया जाता कि ' फूट डालो और राज करो' की इस ब्रिटिश नीति का भारत के लोग और विशेष रूप से क्रांतिकारी संगठनों के लोग किस प्रकार प्रतिरोध कर रहे थे ? उन्होंने इसके विरुद्ध कोई नीति अपनाई या नहीं अपनाई ? साथ ही यह भी नहीं बताया जाता कि ब्रिटिश सरकार की ' फूट डालो और राज करो ' की नीति का कांग्रेस किस प्रकार विरोध कर रही थी ? उसने विरोध किया या नहीं किया ?
यदि इन बातों पर विचार करें तो कांग्रेस ने तो कभी ब्रिटिश सरकार की ' फूट डालो और राज करो' की नीति का जमकर विरोध नहीं किया, वह ब्रिटिश सरकार की इस नीति के विरोध में आकर समानांतर चलती रही और जिस वर्ग का ब्रिटिश सरकार पक्ष पोषण करती आ रही थी उसी का साथ देने का निर्णय कांग्रेस ने भी ले लिया । बात स्पष्ट थी कि उसने ब्रिटिश सरकार की ' फूट डालो और राज करो ' की नीति का विरोध न करके मुस्लिम तुष्टिकरण को अपना लिया। अब दूसरी ओर यदि दृष्टिपात किया जाए तो उधर हमारा क्रांतिकारी आंदोलन था। जिसके नेताओं ने ब्रिटिश सरकार की इस नीति का पहले दिन से जमकर विरोध करना आरंभ किया। उसने हरसंभव प्रयास किया कि हम सब एक हैं और एक होकर ब्रिटिश सरकार को भारत से बाहर करके ही दम लेंगे।
क्रांतिकारी आंदोलन के नेताओं ने ब्रिटिश सरकार की " फूट डालो और राज करो " की इसी घातक नीति का विरोध करने का निर्णय लेकर ' वंदे मातरम' को अपना हथियार बनाया। जब ब्रिटिश सरकार ने देखा कि ' वंदे मातरम' के नारे ने भारत के लोगों के भीतर एकता का भाव पैदा करने में चमत्कारिक प्रभाव दिखाना आरंभ कर दिया है तो उसने धीरे-धीरे मुसलमानों को भड़काना आरम्भ किया। वास्तव में उन दिनों ' वंदे मातरम ' का नारा ब्रिटिश सरकार की इस ' फूट डालो और राज करो' की नीति का सटीक उत्तर बनकर सामने आया था। इसने भारत के लोगों के भीतर राष्ट्रवाद और एकता की भावना को जगाकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंक दिया।


हजारों लोगों को करनी पड़ी थी जेल यात्रा


जिन लोगों ने ब्रिटिश सरकार द्वारा वंदे मातरम पर रोक लगाने के विरोध में सड़कों पर उतरकर ब्रिटिश सरकार का विरोध करना आरंभ किया, उनके विरुद्ध ब्रिटिश सरकार ने कठोरता का प्रदर्शन किया। फलस्वरूप हजारों लोगों को जेल की यात्रा करनी पड़ी। परंतु जेलों की यात्रा से हमारा कोई भी क्रांतिकारी भयभीत नहीं हुआ। जेलों को उन्होंने अपना ' घर' समझकर अपनी जेल यात्रा का स्वागत किया।
आम नागरिक भी अपने स्वतंत्रता सेनानियों का साथ दे रहे थे और यदि उनमें से भी किसी को जेल जाना पड़ा तो उन्होंने भी इस पर कोई आपत्ति व्यक्त नहीं की। १९०६ में बारीसाल (पूर्वी बंगाल) में ' वंदे मातरम' के नारे लगाने पर ब्रिटिश सरकार की ओर से प्रतिबंध लगाया गया। जिन लोगों ने ब्रिटिश सरकार के इस आदेश का उल्लंघन किया, उन्हें पुलिस दमन का शिकार होना पड़ा। पुलिस ' वंदे मातरम' के नारे को अपने विरुद्ध विद्रोह कहती थी और लोग इस विद्रोह को बार-बार करते जा रहे थे। परिणाम स्वरूप हजारों लोगों ने जेल यात्राएं की। जिनमें स्वतंत्रता सेनानी, मजदूर , छात्र और आम नागरिक भी सम्मिलित थे। लोगों ने जेलों को अपना घर बना लिया था। एक दूसरे से संवाद में लोग अक्सर कहते भी सुने जाते थे कि जेल हम जैसे लोगों के लिए ही बनी है अर्थात जिन पर राष्ट्रभक्ति का भूत सवार होता है, जेल उनका घर अपने आप बन जाता है।
१९०८ में तूतीकोरिन तमिलनाडु में वंदे मातरम के नारे लगाने वाले १००० मजदूरों को ब्रिटिश सरकार ने उठाकर जेल में डाल दिया था। यह घटना २७ फरवरी १९०८ की है। उस दिन कोरल मिल के लगभग १००० मजदूर स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी के साथ अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए अपना विरोध व्यक्त कर रहे थे। ये सारे कर्मचारी ब्रिटिश अधिकारियों की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध हड़ताल पर चले गए थे। उनको भी 'वंदे मातरम' के जयघोष ने बहुत अधिक प्रभावित किया था। उनके ' वंदे मातरम' के जयघोष से धरती और आसमान गूंज रहे थे। ब्रिटिश अधिकारी इस जयघोष को सुनकर ही घबरा गए थे। क्योंकि उन्होंने देश के अन्य स्थानों पर होने वाली घटनाओं के बारे में सुन रखा था और यह भी भली प्रकार समझ लिया था कि ' वंदे मातरम' के जयघोष से भारत के लोग किस प्रकार क्रांति के लिए तैयार हो जाते हैं ?


भारत का यौवन मचल रहा था


जब कोई समाज या कोई राष्ट्र अनेक प्रकार के अत्याचारों को सहन करने के उपरांत भी अपनी स्वाधीनता और आत्मसम्मान की लड़ाई को निरंतर जारी रखता है, तब उसे अपने अभीष्ट को प्राप्त करने से कोई रोक नहीं पाता है। भारत के भीतर मचलन थी। अपनी खोई हुई स्वाधीनता को प्राप्त करने की हार्दिक इच्छा थी। जिसके लिए भारत का यौवन मचल रहा था। ब्रिटिश सरकार उसका जितना ही अधिक दमन करने का प्रयास करती थी, वह उतना ही अधिक उग्र होता जाता था। अपने राष्ट्र, अपनी स्वाधीनता, अपने धर्म और अपनी संस्कृति के लिए उग्र होना हमारा एक वैदिक संस्कार है। जिसे हमने तेजस्विता के स्वरूप में स्वीकार किया है। यही संस्कार था जो हमारा पराभव के उस काल में निरंतर मार्गदर्शन कर रहा था। अत्याचार थे कि हम पर कोई प्रभाव नहीं दिखा पा रहे थे। यही कारण था कि जिन लोगों को ब्रिटिश सरकार ने उठाकर जेल में डाला था उनकी देशभक्ति वहां भी उनके मन मस्तिष्क पर सवार रही और वे निरंतर ' वंदे मातरम' का उद्घोष जेल के भीतर भी करते रहे ।इस प्रकार ' वंदे मातरम' ब्रिटिश सरकार के लिए जी का जंजाल बन चुका था। जिसे वह सटक भी नहीं पा रही थी और उल्टी भी नहीं कर पा रही थी। यदि सटकने का प्रयास करती थी तो भी उसे कष्ट हो रहा था और यदि उल्टी करने का प्रयास करती थी तो भी उसे कष्ट होना निश्चित था।
यह बहुत ही प्रसन्नता का विषय है कि ब्रिटिश काल में उन दिनों कुछ ब्रिटिश अधिकारियों पर भी ' वंदे मातरम' का रंग चढ़ गया था। जिसे वह हमारे स्वाधीनता सेनानियों क्रांतिकारी या आम नागरिकों के साथ बोलने लगे थे। समाचार पत्र ' दैनिक भास्कर' के अनुसार एलसी लैडली और पीएच होल्डन जैसे अधिकारी तो जेल में भी हमारे स्वाधीनता सेनानियों के साथ मिलकर ' वंदे मातरम' का जय घोष करने लगे थे। ब्रिटिश सरकार को जब अपने ही अधिकारियों के बारे में इस प्रकार की जानकारी हुई तो उसने उन्हें भी उठाकर जेल में डाल दिया था।

बारिसाल का अभूतपूर्व ' वंदे मातरम' जुलूस


' वंदे मातरम' को लेकर जिस प्रकार आंदोलन अपने उफान पर था, वह जहां भारतवासियों के लिए उत्साह का संचार करने वाला बन गया था, वहीं ब्रिटिश सरकार को वह निरंतर भयभीत करता जा रहा था। ब्रिटिश सरकार बौखलाहट में निर्णय लेती जा रही थी। २० मई १९०६ को बारिसाल ( बांग्लादेश) में हमारे क्रांतिकारियों ने बंग - भंग को लेकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध एक अभूतपूर्व विशाल जुलूस का आयोजन किया। बताया जाता है कि इस जुलूस में लगभग १०००० लोगों ने भाग लिया था। तब अनेक मुस्लिम भी ऐसे थे जो हिंदू समाज के लोगों का साथ दे रहे थे और साथ-साथ मिलकर वंदे मातरम का जयघोष कर रहे थे। यदि किसी को आपत्ति भी थी तो उसने घर से निकलना ही उचित नहीं माना था। क्योंकि सी३वंदे मातरम' हम सब का सामूहिक जयघोष बन गया था, जिसने राष्ट्रीय एकता की मिसाल स्थापित की थी।
मुसलमानों द्वारा हिंदुओं का इस प्रकार साथ दिया जाना अंग्रेजों को किसी भी प्रकार से स्वीकार्य नहीं था। क्योंकि उनकी सोच तो ' फूट डालो और राज करो' की नीति के आसपास घूमती थी।


लाहौर का विशाल प्रदर्शन


लाहौर हमारी क्रांतिकारी का गढ़ रहा है और आर्य समाज के लिए तो यह किसी ' नालंदा' से कम नहीं था। आर्य समाज के अनेक ऐसे क्रांतिकारी नायक रहे जिन्होंने लाहौर में रहकर शिक्षा प्राप्त की थी। कितने ही क्रांतिकारी इसी शहर में पहुंचकर एक दूसरे के साथ विचार - विमर्श किया करते थे। शिक्षा केंद्र होने के कारण लोगों के भीतर राष्ट्र जागरण का भाव बड़ी तीव्रता से उत्पन्न हुआ था। इसलिए यहां पर अनेक क्रांतिकारी घटनाएं भी घटित हुईं।
मई १९०७ में यहां पर लोगों ने वंदे मातरम का नारा लगाते हुए विशाल प्रदर्शन किया था। इस प्रकार के प्रदर्शनों की अंग्रेजी राज में छूट नहीं थी। इसलिए ब्रिटिश सरकार ने इस प्रदर्शन को सरकारी आदेश का उल्लंघन माना। प्रदर्शनकारियों का यह जुलूस निरंतर आगे बढ़ता जा रहा था और ' वंदे मातरम' का उद्घोष भी निरंतर जोर पकड़ता जा रहा था। उस समय रावलपिंडी में स्वदेशी नेताओं की गिरफ्तारी की गई थी। उस गिरफ्तारी के विरोध में ही लोगों ने इस जुलूस का आयोजन किया था। बड़ी संख्या में लोगों ने आकर जुलूस को सफल बनाने का राष्ट्रभक्ति से भरा कार्य किया था।


लोकमान्य तिलक और वंदे मातरम


मुंबई पुलिस कोर्ट में लोकमान्य तिलक के मुकदमे की सुनवाई चल रही थी। तब भी " वंदे मातरम " ने अपना विशेष प्रभाव दिखाया था। बात १९०८ की है। जब अंग्रेजी सरकार के द्वारा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को मांडले जेल के लिए भेजने की तैयारी की जा रही थी। जैसे ही लोगों को इस बात की जानकारी हुई कि ब्रिटिश सरकार हमारे महान नेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को मांडले जेल के लिए भेज रही है तो बड़ी संख्या में लोग मुंबई पुलिस कोर्ट के बाहर आकर एकत्र हो गए। हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों की एक ही मांग थी कि हमारे महान नेता बाल गंगाधर तिलक को मांडले जेल न भेजा जाए। वे जोर-जोर से ' वंदे मातरम' का नारा लगा रहे थे, और अपनी राष्ट्रीय एकता का परिचय दे रहे थे।
' वंदे मातरम' के जयघोष से हमारे देश के लोग गूंगी - बहरी अंग्रेजी सरकार के कान खोलना चाहते थे। यद्यपि ' वंदे मातरम ' को ब्रिटिश सरकार ने १९०५ में ही प्रतिबंधित कर दिया था, परंतु लोग थे कि मानते नहीं थे। उनके लिए सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के उपरांत भी ¿वंदे मातरम' गाना एक फैशन बन गया था। हमारे देश के लोगों के लिए वंदे मातरम गाना ब्रिटिश सरकार का विरोध करने का एक अच्छा प्रतीक बन गया था। यद्यपि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को माण्डले जेल स्थानांतरित करने के अपने निर्णय पर ब्रिटिश सरकार अडिग रही, परंतु भारत के लोगों ने भी उसे यह दिखा दिया कि यदि वह अपने निर्णय पर अडिग है तो हम भी अपने निर्णय पर अडिग हैं यानी हम भी उसके आदेशों का पालन नहीं करेंगे।
राजनीति में अपनी मांगों को मनवाने के लिए ही प्रदर्शन या विरोध व्यक्त नहीं किए जाते हैं, अपितु विरोध व्यक्त करने के कभी-कभी संदेश भी दिए जाते हैं और वे संदेश इतने मजबूत होते हैं कि सरकारें चाहे कितना ही तानाशाही रूप क्यों न दिखा रही हों, परन्तु उनके हृदय पर इन प्रदर्शनों की गहरी चोट लगती है। यही स्थिति उस समय ब्रिटिश सरकार की बन चुकी थी।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जैसे नेता के लिए बड़ी संख्या में लोगों का बाहर आना अनिवार्य था। अब निहत्थे होकर वे सरकार से युद्ध तो नहीं कर सकते थे, परंतु सरकार के प्रति अपने विरोध को व्यक्त करते हुए उसे एक अच्छी चुनौती अवश्य दे सकते थे। इस विरोध को व्यक्त करने के लिए ही हमारे लोग ' वंदे मातरम' का जय घोष करते थे। ब्रिटिश सरकार को हमारे लोगों का यह जयघोष इसलिए भी बुरा लगता था क्योंकि उसने इस नारे पर प्रतिबंध लगा दिया था। प्रतिबंध के उपरांत भी इसका लगाया जाना भारत के लोगों के उस नैतिक साहस की ओर संकेत करता था, जो अत्याचारी सरकार का विरोध करने के लिए किसी भी प्रकार से हार का मुंह नहीं देखना चाहते थे।

धरने प्रदर्शन और ' वंदे मातरम'

स्वाधीनता आंदोलन के काल में देश के लोगों को अनेक धरने प्रदर्शन करने पड़े थे। आओ के बाद जितने भी धरने प्रदर्शन भारतवर्ष में हुए उन सबका एकमात्र उद्देश्य भारत की स्वाधीनता का था इन सभी धरना प्रदर्शनों में भारत के लोग बढ़ चढ़कर भाग लेते थे और वंदे मातरम के माध्यम से सरकार तक अपना विरोध पहुंचाते थे।

( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीयप्रणेता हैं )

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