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पौष पीठा – लोकगीत के रूप में

पौष पीठा –  लोकगीत के रूप में 

रचना:-   ✍️ डॉ.  रवि शंकर मिश्र "राकेश"
(टेक)
पौष आइल हो सजन, आइल सोंसे रात,
माटी के चूल्हा सुलगे, जगे घर-घर बात।
गुड़ चूरे, चावल भीजे, भाप उठे मीठ,
अंगना में मुस्काए आज, पौष पीठा गीत॥

(अंतरा – 1)
भोर से जागे मइया, ओस भीगे पाँव,
धान कूटे खलिहन में, गूँजे ढेंकी ठाँव।
नानी गावे सोहरिया, नाचा छपर छीत,
धीरज धरके बनत बा, पौष पीठा प्रीत॥
(टेक)
पौष आइल हो सजन…

(अंतरा – 2)
न दूध मलाई, न बाजार ठाठ,
गुड़ के रस में घुल गइल, पुरखन के पाठ।
माटी-सोंसे के स्वाद में, मोल अनमीत,
कौड़ी ना लागे सोना-सा, पौष पीठा रीत॥
(टेक)
पौष आइल हो सजन…

(अंतरा – 3)
बाबा बोले – “खा ले बेटा, जाड़ा होई दूर”,
एक कौर में घुल जाला, खेत-खेत के सूर।
चूल्हा धुँआ बने बादर, भोर लिखे जीत,
संग लोरू मुस्कान घुले, पौष पीठा गीत॥
(टेक)
पौष आइल हो सजन…

(अंतरा – 4)
शहर गइल मन पूछे आज, का भूइल संस्कार?
पीठा बोले – “जड़ में बसें, संस्कृति के सार।”
जब ले खेत-खेत में, धान-सपाट मीत,
तब ले जीवित रहिहें, पौष पीठा प्रीत॥
(समापन टेक)
पौष आइल हो सजन, आइल सोंसे रात,
पीठा में बसल बा बिहार, माटी के सौगात॥
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