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"पीड़ा से परिपक्वता तक"

"पीड़ा से परिपक्वता तक"

पंकज शर्मा
दुःख एवं पीड़ा मनुष्य के जीवन में केवल बाधाएँ नहीं होतीं, वे आत्मा की कसौटी भी होती हैं। जब जीवन सहजता के आवरण को हटाकर हमें संघर्ष की अग्नि में उतारता है, तब हमारी आंतरिक शक्ति का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है। जो आत्माएँ इस अग्नि से पलायन नहीं करतीं, वही भीतर से अधिक सशक्त, अधिक जाग्रत एवं अधिक संवेदनशील होकर उभरती हैं। पीड़ा मनुष्य को तोड़ने नहीं, बल्कि उसे उसकी ही गहराइयों से परिचित कराने आती है।

महान व्यक्तित्वों का निर्माण किसी सुरक्षित एवं समतल मार्ग पर नहीं होता। उनके व्यक्तित्व की आकृति अनुभवजन्य घावों एवं अमिट निशानों से गढ़ी जाती है, जो उन्हें सहानुभूति, करुणा एवं विवेक प्रदान करते हैं। ये घाव कमजोरी के प्रतीक नहीं, बल्कि साधना के चिह्न हैं। जो इन्हें स्वीकार कर आत्मसात कर लेता है, वही जीवन के रहस्यों को समझ पाता है एवं अपनी पीड़ा को प्रकाश में रूपांतरित कर देता है।

. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
 पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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