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"आगामी क्षितिज का स्वप्न"

"आगामी क्षितिज का स्वप्न"

पंकज शर्मा
​वह जो सुदूर क्षितिज पर
अटका है एक धुंधला-सा प्रकाश,
वही है मनुज की आदिम भूख का
एक अंतिम और मौन प्रवास।


​न होगा तब कोई बेघर, न दर-बदर,
हर शीश को मिलेगी अपनी एक छत,
जहाँ न भय की शीत होगी,
न शोषण का कोई क्रूर मत।


​खेतों की छाती फाड़कर जो निकला है,
वह स्वर्ण-कण—अन्न का दाना,
अब किसी तिजोरी का कैदी न होगा,
वह होगा हर भूखे कंठ का तराना।


​अतृप्त जठराग्नि की वह करुण ज्वाला
जो आज सपनों को धुएँ में बदलती है,
वही कल न्याय की शीतल समिधा बन
शांति की मशाल बनकर जलती है।


​दार्शनिक है यह सत्य, कि धरा सबकी है,
फिर क्यों ये सीमाएँ, ये ऊँची दीवारें?
क्यों कुछ के सपने महलों में पलते,
और कुछ के फुटपाथों पर दम हारें?


​परिवर्तन का महाशंख अब फूँकना होगा,
जब जगेगा विवेक, मिटेगा यह अंधियारा,
हक़ की रोटी जब स्वाभिमान से मिलेगी,
तब सार्थक होगा यह जीवन सारा।


​अक्षत रहेंगे तब वे कोमल सपने
जो आज धूल में बिखरे पड़े हैं,
हृदय की धड़कन और श्रम की शक्ति
देखो, कल के द्वार पर दृढ़ खड़े हैं।


​आएगा वह दिन, जब समता का सूरज
हर आँगन को एक जैसा रँगेगा,
न कोई याचक होगा, न कोई दाता—
संसार बस प्रेम और रोटी में बँटेगा।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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