"विनय में निवास करता विवेक"
पंकज शर्मा
मनुष्य प्रायः ऊँचाइयों की आकांक्षा में अपने भीतर के मौन को खो बैठता है। उपलब्धि, प्रतिष्ठा एवं अहं के शिखर पर पहुँचकर उसे प्रतीत होता है कि उसने ज्ञान का चरम पा लिया है, किंतु उन्हीं ऊँचाइयों पर दृष्टि संकीर्ण एवं संवेदना बोझिल हो जाती है। विनय से झुकना किसी प्रकार का आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि आत्मबोध का वह द्वार है जहाँ मन सुनना सीखता है एवं चेतना का विस्तार आरंभ होता है।
आध्यात्मिक यात्रा में विवेक वही पाथेय है जो नम्रता से सहज रूप में प्राप्त होता है। झुकना हमें पृथ्वी, समाज एवं परमार्थ—तीनों से जोड़ता है। जब अहं का भार उतरता है, तब अंतःकरण निर्मल होता है, एवं उसी निर्मलता में सत्य स्वयं समीप आकर मनुष्य को आलोकित कर देता है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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