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भारत 2026 में ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है - जहाँ “अपेक्षाएँ अधिक हैं और धैर्य कम”

भारत 2026 में ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है - जहाँ “अपेक्षाएँ अधिक हैं और धैर्य कम”

दिव्य रश्मि के उपसम्पादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से |

जैसे ही वर्ष 2025 इतिहास के पन्नों में एक उथल-पुथल भरे, घटनाओं से लदे और अनेक विरोधाभासों वाले वर्ष के रूप में दर्ज होता है, भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ पीछे मुड़कर देखने पर पीड़ा, संघर्ष, आशंका और चेतावनियाँ हैं, तो आगे निगाह डालने पर सावधानी से भरी उम्मीद, आत्मविश्वास और संभावनाओं की एक लंबी शृंखला। 2026 में प्रवेश करते समय देश की मनःस्थिति किसी उन्मादी उत्सव की नहीं है, बल्कि यह एक परिपक्व राष्ट्र की तरह है जो अपने अनुभवों से सीख चुका है और जानता है कि हर उपलब्धि के साथ नई चुनौतियाँ जन्म लेती हैं। फिर भी, बीते वर्ष की दहलीज से उम्मीद मुस्कुराती हुई फुसफुसाती है कि आने वाला समय अधिक स्थिर, अधिक सशक्त और संभवतः अधिक खुशहाल हो सकता है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या वास्तव में ऐसा होगा, या यह केवल आत्मसांत्वना है। लेकिन जब हम 2025 के घटनाक्रमों, उपलब्धियों और संघर्षों को एक समग्र दृष्टि से देखते हैं, तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत के पास आत्मगौरव के लिए बहुत कुछ है और आत्मविश्वास के लिए उससे भी अधिक।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कथन कि भारत आज आत्मविश्वास से भरा हुआ है और भविष्य को लेकर आशान्वित है, केवल एक राजनीतिक वक्तव्य भर नहीं लगता है, बल्कि यह उस व्यापक राष्ट्रीय भावना का प्रतिबिंब है जो पिछले कुछ वर्षों में विकसित हुई है। 2025 ने भारत को कई मोर्चों पर परखा, सुरक्षा, कूटनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक ताना-बाना, तकनीकी क्षमता और सांस्कृतिक चेतना। अनेक स्थानों पर उसने अपेक्षाओं से बेहतर प्रदर्शन भी किया। ऑपरेशन सिंदूर जैसे सैन्य अभियान ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक और साहसी रुख अपनाने वाला राष्ट्र है। इस ऑपरेशन ने न केवल सुरक्षा प्रतिष्ठान का मनोबल बढ़ाया है, बल्कि आम नागरिकों में भी यह विश्वास पैदा किया है कि राष्ट्र की सीमाएँ और संप्रभुता किसी भी कीमत पर सुरक्षित रखी जाएँगी। यह विश्वास ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब वैश्विक परिदृश्य अस्थिरता, युद्धों और भू-राजनीतिक खींचतान से भरा हुआ है।

2025 का महाकुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति का विराट प्रदर्शन था। करोड़ों लोगों का संगम, विविधताओं का समन्वय और परंपरा एव आधुनिक प्रबंधन का अद्भुत मेल यह दर्शाता है कि भारत अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है, लेकिन भविष्य की ओर भी उतनी ही दृढ़ता से अग्रसर है। महाकुंभ के सफल आयोजन ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि विशाल पैमाने पर व्यवस्थापन, सुरक्षा और स्वच्छता जैसे जटिल कार्यों को भी कुशलता से संभाल सकता है। यह आयोजन वैश्विक मीडिया में चर्चा का विषय बना और भारत की सॉफ्ट पावर को नई ऊँचाइयों तक ले गया।

अयोध्या में राम मंदिर के ध्वजारोहण समारोह ने 2025 को एक ऐतिहासिक और भावनात्मक आयाम दिया। दशकों तक चले विवाद, राजनीति और सामाजिक विमर्श के बाद, यह क्षण केवल एक धार्मिक उपलब्धि नहीं था, बल्कि यह उस दीर्घकालिक सामाजिक प्रक्रिया का प्रतीक था जिसमें संवाद, न्यायिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर समाधान खोजा गया। इस समारोह ने अनेक लोगों के लिए आस्था की पुष्टि की, तो कुछ के लिए यह एक नए सामाजिक संतुलन की शुरुआत थी। महत्वपूर्ण यह रहा कि यह आयोजन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ, जिसने यह संकेत दिया कि भारत धीरे-धीरे संवेदनशील मुद्दों पर भी परिपक्वता के साथ आगे बढ़ने की क्षमता विकसित कर रहा है।

खेल के मैदानों पर 2025 भारत के लिए गौरवशाली रहा है। पुरुषों की क्रिकेट आईसीसी चैंपियनशिप जीत ने लंबे समय से प्रतीक्षित एक स्वप्न को साकार किया और देशभर में उत्साह की लहर दौड़ा दी। यह जीत केवल एक ट्रॉफी नहीं थी, बल्कि यह वर्षों की मेहनत, प्रणालीगत सुधारों और युवा प्रतिभाओं पर विश्वास का परिणाम था। इसके साथ-साथ महिला क्रिकेट विश्व कप और महिला ब्लाइंड टी20 विश्व कप की जीत ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय खेल जगत में अब सफलता किसी एक वर्ग या लिंग तक सीमित नहीं है। महिला खिलाड़ियों की उपलब्धियों ने समाज में प्रेरणा का संचार किया और यह संदेश दिया कि अवसर मिलने पर भारतीय महिलाएँ वैश्विक मंच पर किसी से कम नहीं हैं। विशेष रूप से महिला ब्लाइंड टीम की जीत ने समावेशन और दृढ़ संकल्प की एक नई कहानी लिखी, जिसने लाखों लोगों को भावनात्मक रूप से छुआ।

विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी 2025 भारत के लिए ऐतिहासिक रहा। शुक्ला का इंटरनैशनल स्पेस स्टेशन में पहले भारतीय के रूप में पहुँचना केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि यह उस दीर्घकालिक वैज्ञानिक दृष्टि का परिणाम था जिसे भारत ने दशकों पहले अपनाया था। इस उपलब्धि ने युवा पीढ़ी को यह सपना देखने की प्रेरणा दी कि सीमाएँ केवल मानसिक होती हैं, और सही दिशा, संसाधन और संकल्प के साथ भारत किसी भी क्षेत्र में अग्रणी बन सकता है। अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भारत की बढ़ती भूमिका ने यह भी दर्शाया कि देश अब केवल किफायती प्रक्षेपण सेवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि गहन अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में भी अपनी पहचान बना रहा है।

इन उपलब्धियों के बीच 2025 ने भारत को कई कठोर वास्तविकताओं से भी रू-बरू कराया। वैश्विक अर्थव्यवस्था की सुस्ती, आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधाएँ, ऊर्जा सुरक्षा की चिंताएँ और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों ने नीति-निर्माताओं के सामने कठिन प्रश्न खड़े किए। देश के भीतर भी बेरोजगारी, महँगाई और सामाजिक असमानताओं जैसे मुद्दे पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। शहरी और ग्रामीण भारत के बीच की खाई, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में असमानता, और डिजिटल डिवाइड जैसी चुनौतियाँ अभी भी समाधान की प्रतीक्षा कर रही हैं। 2026 में कदम रखते समय यह आवश्यक है कि उत्सव और उपलब्धियों के शोर में इन मुद्दों को अनदेखा न किया जाए।

राजनीतिक दृष्टि से भारत 2026 में एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ अपेक्षाएँ अधिक हैं और धैर्य कम। जनता अब केवल नारों से संतुष्ट नहीं है, वह ठोस परिणाम चाहती है। शासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता की माँग बढ़ रही है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने नागरिकों को आवाज दी है, लेकिन इसके साथ ही दुष्प्रचार और ध्रुवीकरण की समस्याएँ भी बढ़ी हैं। ऐसे में लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और स्वतंत्रता का प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत की ताकत हमेशा से उसका लोकतांत्रिक ढाँचा रहा है और 2026 में इस ताकत को और सुदृढ़ करना एक प्रमुख चुनौती और अवसर दोनों होगा।

वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका लगातार बदल रही है। 2025 में जिस तरह से भारत ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संतुलित और आत्मविश्वासी रुख अपनाया, उसने यह संकेत दिया कि देश अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी बनने की ओर अग्रसर है। बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, उसके संबंधों की विविधता और उसकी आर्थिक-तकनीकी क्षमता उसे एक विशिष्ट स्थान देती है। 2026 में यह भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी, क्योंकि दुनिया जलवायु परिवर्तन, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह विकासशील और विकसित देशों के बीच एक सेतु की भूमिका निभाए।

सांस्कृतिक स्तर पर 2025 ने यह भी दिखाया कि भारत अपनी विविधताओं के बावजूद एक साझा पहचान की खोज में लगा हुआ है। भाषा, धर्म, क्षेत्र और परंपरा की विविधता कभी-कभी तनाव का कारण बनती है, लेकिन यही विविधता भारत की सबसे बड़ी शक्ति भी है। 2026 में यह आवश्यक होगा कि इस विविधता को विभाजन का नहीं, बल्कि संवाद और सहअस्तित्व का आधार बनाया जाए। साहित्य, सिनेमा, कला और मीडिया की भूमिका यहाँ महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि यही क्षेत्र समाज के मनोभावों को आकार देता है।

युवा भारत 2026 की सबसे बड़ी पूँजी है। 2025 में जिस तरह से स्टार्टअप संस्कृति, तकनीकी नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा मिला, उसने यह संकेत दिया है कि युवा पीढ़ी केवल नौकरी खोजने वाली नहीं है, बल्कि अवसर सृजित करने वाली बन रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा, जैव-प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में भारत के युवाओं की बढ़ती भागीदारी भविष्य के लिए आशाजनक है। किंतु इसके साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि शिक्षा प्रणाली को अधिक समावेशी, व्यावहारिक और भविष्य-उन्मुख बनाया जाए, ताकि यह ऊर्जा सही दिशा में प्रवाहित हो सके।

2026 में प्रवेश करते समय भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न शायद यह है कि क्या वह अपनी उपलब्धियों को स्थायी प्रगति में बदल पाएगा। क्या सैन्य सफलता केवल शक्ति प्रदर्शन तक सीमित रहेगी, या वह दीर्घकालिक शांति और सुरक्षा की नींव रखेगी। क्या धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों से उत्पन्न भावनात्मक ऊर्जा सामाजिक सद्भाव में परिवर्तित होगी। क्या खेल और विज्ञान की उपलब्धियाँ व्यापक सामाजिक प्रेरणा बनेगी या वे क्षणिक उत्साह तक सीमित रह जाएँगी। इन प्रश्नों के उत्तर आने वाला समय देगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि भारत के पास संसाधन, प्रतिभा और संकल्प की कमी नहीं है।

2026 कोई जादुई वर्ष नहीं है जो स्वयं सभी समस्याओं का समाधान कर देगा। यह एक और अध्याय है उस लंबी कहानी का, जिसे भारत सदियों से लिखता आ रहा है, संघर्षों, पुनर्निर्माण, आत्ममंथन और पुनर्जागरण की कहानी। 2025 की उथल-पुथल ने देश को थकाया जरूर है, लेकिन तोड़ा नहीं है, बल्कि शायद इसने उसे और अधिक यथार्थवादी, अधिक सतर्क और अधिक आत्मविश्वासी बना दिया है। जब उम्मीद फुसफुसाती है कि आने वाला समय बेहतर हो सकता है, तो यह कोई खोखला आश्वासन नहीं लगता है, बल्कि अनुभव और उपलब्धियों से उपजा एक शांत विश्वास प्रतीत होता है। यदि यह विश्वास विवेक, समावेशन और निरंतर प्रयास के साथ जुड़ा रहा, तो संभव है कि 2026 वास्तव में वह वर्ष बनेगा, जिसे भारत पीछे मुड़कर देखते हुए संतोष और गर्व के साथ याद कर सकेगा। 

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