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क्यों समझते खुद से महान?

क्यों समझते खुद से महान?

आत्मियता का था मान कभी, 

बुजुर्गों का होता था सम्मान कभी। 
नारियों को समझा जाता गुलाम, 
अतिथियों का भूल गए क्यों सम्मान। 

क्या पूर्वजों ने तुम्हें  यही सिखाया , 
क्या तुम्हें गंदी धारणाओं से नहलाया। 
मत मानो स्वर्ग नर्क की अबधारणा, 
मत भूलो मानवता का धर्म निभाना। 

अराजकता के दलदल में, 
मुँह  मराया  सब  दल  में। 
हद  तो  जाकर तब  हुआ, 
जब लकीर खिंचा अपनों में। 

निरीह बन कर देखता रहा,
सोंचा था न कभी सपनों में। 
ऐसा भी दिन देखना होगा, 
दरार पड़ेगा कभी अपनों में। 

जहां होता नहीं नारी सम्मान , 
अपने भी बन जाते अंजान। 
सुन व्यथा पक गए हैं कान, 
क्यों समझते खुद से महान? 

✍️ डॉ रवि शंकर मिश्र "राकेश "
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