श्रद्धाँजलि
भोंचूशास्त्रीजी आज बड़ी जल्दबाजी में थे, इस कारण खिड़की से ही आवाज लगाते हुए आगे निकल गए— “ मैं चलता हँ गुरु ! तुम पीछे से आ जाना । वहीं बड़े वाले मैदान में मुलाकात हो जायेगी । अगली पंक्ति में तो मुझे जगह मिलने से रही, किन्तु पिछली पंक्ति में भला कौन रोकने वाला पैदा हुआ है ! वहीं कहीं नजर आ ही जाउँगा। ”
अचानक कट गए नेटवर्क की तरह शास्त्रीजी की आवाज गुम हो गयी । मैं समझ गया कि वो निकल चुके हैं । जल्दी से तैयार होकर चल दिया उस ओर जिधर का इशारा शास्त्रीजी ने किया था ।
कुछ दूर ही आगे बढ़ा कि पान की दुकान पर दो लोगों के साथ खड़े, मगही पान की ‘ जुगाली ’ करते मिल गए शास्त्री महाराज । उनका किसी व्यक्ति से साथ कहीं खड़ा होना और उस पर भी पान की दुकान पर खड़ा होना, और उससे भी आश्चर्य कि पान खाते हुए नजर आना—ये सब विश्व के आठवें, नौवें और दसवें अजूबे में शामिल करने योग्य है ।
लपक कर मैं भी वहीं पहुँच गया। शास्त्रीजी तो सिर्फ सिर हिलाकर रह गए, परन्तु बाकी के दो लोग ‘शेकहैंड’ की मुद्रा में हाथ बढ़ाये मेरी ओर ।
शास्त्रीजी के साथ लम्बे समय से रहते-रहते मैं भी कुछ कुछ ‘उजबक’ सा हो चला हूँ । ये हाथ मिलाना- पता नहीं कौन सी पराम्परा है- सीधे पछुआ बयार में बह कर आयी है या कहीं शनिलोक से- मुझे मालूम नहीं । इतना तो तय है कि ये हमारी भारतीय परम्परा नहीं है । हम या तो पैर छूते थे या गले लिपटते थे, मगर आजकल तो लोग एकदम से गले पड़ने लगे हैं । आप चाहें न चाहें, पहले ही हाथ जोड़ दें, फिर भी लोग मानेंगे नहीं । बेशरमी पूर्वक हाथ बढ़ा ही देंगे। सामने वाली यदि महिला हो तो उसका बचना और भी मुश्किल । वो बेचारी लाख हाथ-पैर जोड़े परन्तु अलगा तो बिना हाथ मिलाये, कोमल हथेली को कसकर दबाये, मानने से रहा ! जिस रफ्तार से हम विकास कर रहे हैं, उससे लगता है कि बहुत जल्दी ही गाल और होठ मिलाना भी बिलकुल आमबात हो जायेगी । पैर छूने के बजाय, घुटना छूना तो ट्रेंड हो ही चला है। अब भला कौन अपने बेशकीमती जींस-पैन्ट की बेइज्जती कराने को नीचे झुके !
मैंने सीधे हाथ जोड़कर उन सज्जनों का अभिवादन किया, जो नजर में किसी ऐंगल से सज्जनता की सूची में शामिल करने योग्य नहीं थे, जैसा कि सरकार की नजर में ब्राह्मण आरक्षण सूची में ।
दुकानदार ने पान की गिलौरी मेरी ओर भी बढ़ायी, किन्तु मुझे कुछ कहने से पहले ही शास्त्रीजी उचर उठे – ‘ देखने में भले ही छोटे हैं, किन्तु हम इन्हें गुरुजी ही कहा करते हैं और हमारे गुरुजी ने अभी तक आयुर्वेद की किताब में ताम्बूल भक्षण का त्रयोदश गुणानुशंसा नहीं पढ़ा-जाना है, यानी कि पान से बिलकुल परहेज है इन्हें । ’
हम चारों जन आगे बढ़े मैदान की ओर। मैंने पूछा—क्या बात है शास्त्रीजी ! आपने कुछ बताया नहीं कि किस आयोजन में जाना हो रहा है बड़े मैदान की ओर ?
शास्त्रीजी आहिस्ते से मुंह बिचकाये और बोले— “ पत्थरों के पुजारी बहुल देश में जो सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण आयोजन हुआ करता है, हमसब आज उसी आयोजन में भाग लेने जा रहे हैं । ”
मेरे साथ-साथ वे दोनों लोग भी शास्त्रीजी की बात पर आश्चर्यचकित हो रहे थे । सच में बड़े अजीब हैं हम । महान लेखक- विद्वान,कलाकार, गुमनामी की जिन्दगी गुजार देते हैं । दाने-दाने को तरसते, दवा के अभाव में दम तोड़ देते हैं और वैसे ही विद्वानों की पाण्डुलिपियों को प्रकाशित करके प्रकाशक करोड़पति बन जाते हैं । जीवन दयनीय और नारकीय स्थिति में गुज़र जाता है, जबकि जीवनोत्तर, मूर्तियाँ बनाने में करोड़ों-अरबों लगा दिये जाते हैं । ऐसे भी लोग हुए हैं जो अपने जीवनकाल में ही बनायी गयी अपनी आदमकद प्रतिमा के चबूतरे पर सोकर शेष समय गुजार दिए हैं । समाज तो वही होता है- पहले भी और बाद में भी, फर्क होता है सिर्फ सोच का । मुर्दा पूजने वाला, भला जिन्दे की फिकर क्यों करेगा !
शास्त्रीजी ने स्वीकारात्मक सिर हिलाया— “ ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है गुरु ! अटलजी की शवयात्रा में कितनी भीड़ थी, कितना मातम था- हम सब जानते हैं और हम ये भी जानते हैं कि सिर्फ एक वोट के कारण अटलजी की सरकार गिर गयी थी । अब जरा तुम ही बताओ- कौन थे ‘ वे ’ लोग जो शवयात्रा में शामिल आँसू बहा रहे थे और कौन थे ‘ वे ’ लोग जिन्होंने सरकार गिरायी ? ”
सो तो है- हम तीनों ने एक साथ हामी भरी ।

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