आज की पत्रकारिता समाज के बदले शासन और सत्ता का प्रतिनिधित्व करने की भूमिकाओं में आ गया है I
पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत लोगों का दबी जुबान से हीं सही अक्सर यह कहना होता है कि सरकार के हस्तक्षेप या प्रबंधन के दबाव के कारण या ख़ुद को अपने आदर्शों से दूर कर लिया है यह आरोप लगाना उसका एक कमज़ोर बहाना है I पत्रकार किसी का पक्षकार नहीं हो सकता I पत्रकारिता बेआवाज़ को आवाज़ देने के लिए तथा शासन और सत्ताधारी वर्ग से जवाबदेही की मांग करने वाले के तौर पर अपनी भूमिका निर्वहन की एक अद्भुत शक्ति है I अगर वह खुद व्यवस्था का हिस्सा बन जाएं और वह व्यवस्था से सवाल नहीं पूछे तो फिर वैसी पत्रकारिता तो निश्चित रूप से विशुद्ध सत्ता और शासन की दलाली हीं है I
पत्रकारिता मिसाल के लिए होती है यह शासन और सत्ता का पक्षकार बनकर समाज के लोगों से बेतुके सवाल पूछने के लिए नहीं I पत्रकारिता एक प्रकार से अपने ताकतवर व्यक्तित्व को एक किरदार के रूप में निभाने की कला है I पत्रकारिता समाजहित के लिए एक सख्त जासूसी की कला है I एक तरह का सनकीपन है जो सत्य के प्रकटीकरण के लिए समर्पित होता है I वास्तव में पत्रकारिता मुसीबतों में घिरा हुआ एक किरदार भी है जो सत्य की तलाश में अपनी लेखनी की तलवार को लेकर झूठ का पर्दाफांस के लिए उसकी तलाश में घूमते रहता है I दिनभर खबरों का पीछा करनेवाला और वास्तविकता को दर्पण के रूप में समाज के समक्ष निष्पक्ष रूप में रखने वाला खबरनबीस आज जीवंत रूप में गिने चुने बिरले हीं हैं I
आज भारतीय मीडिया की बेहद हीं खराब छवि सामने दिखाई दे रही है I चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया प्रायः बहुसंख्य सत्ता और शासन की चाटुकारिता करते दिखाई दे रहे हैं I बल्कि विपक्ष की वाजिब सवाल को भी कटघरे में करते हुए सत्ता और शासन के लिए चाटुकारिता की सीमा रेखाओं से भी पार कर तथाकथित पत्रकारिता करते नजर आ रहे हैं I यानि ठेठ भाषा में कहें तो मज़बूरी में की गई वेश्यागिरी नहीं अपुतु पैसे की मिमंषा के लिए वेश्यागिरी और उसकी भडुवागिरी करते हैं I
आज यह बात किसी से छिपी नहीं है कि आज मीडिया का बड़ा हिस्सा जिसमें प्रिंट और टेलीविजन मीडिया शामिल है, सरकार का चारण बन कर रह गया है I यहां तक कि वे अखबार भी जो खुद को ‘संतुलित’ और ‘मध्यममार्गी’ मानते हैं, वे भी वैसी गंभीर खबरों को पिछले पन्नों पर धकेल दे रहे हैं, जो सरकार को अपने खिलाफ लग सकती है I आज स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि किंचित मीडिया को छोड़कर प्रायः सभी मिडीया प्रायः सभी पत्रकार निजी तौर नरेंद्र मोदी की तरफ अपने एक तरफ़ा झुकाव को छिपाते नहीं हैं I
आज भारतीय मीडिया और पत्रकारों के संघों का व्यवहार या तो संदिग्ध है या उन्होंने अपने तरफ से ही सत्ता और शासन के खिलाफ न जाने की सेंसरशिप को आत्मसात कर लिया है I भारतीय प्रेस काउंसिल पत्रकारों का संगठन नहीं है, लेकिन फिर भी इससे प्रेस की आजादी की हिफ़ाजत करने की उम्मीद की जाती रही है लेकिन यह भी आज सत्ता और शासन का अंधभक्त गुलाम और चाकर की भूमिकाओं में दिखता है I इसके अध्यक्ष भी एकतरफा तरीके से सत्ता और शासन के प्रवक्ता की भूमिकाओं में दिखाई देते हैं I आज किस तरह से निष्पक्ष संस्थाओं को पालतू बना दिया गया है बल्कि बधिया बना दिया गया है उससे सहज यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसके भविष्य की कोख में क्या छिपा है ? समाचार पत्र समूह एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया सरकारी विज्ञापन की लालच में अपना कर्तब्य और दायित्व को भूलकर विमार्गी हो गए हैं I भारत में सामूहिक पत्रकारिता संगठन परंपरागत रूप से कमजोर हो रहे हैं बल्कि उनकी रीढ़ में सत्ता और शासकीय भ्रष्ठाचार का पोषण रस घुलमिल गया है I अथवा उनके रीढ़ को शासन और सत्ता नें क्रूरता से कुचल दिया है जिसके कारण वो लाचार दिख रहे हैं I आज अभिव्यक्ति की आजादी के बुनियादी मसलों को भी चर्चाओं से गौण कर दिया गया है I आज काफी कुछ परदे के पीछे अंजाम दिया जा रहा है और अखबार के प्रबंधनों और संपादकों ने न सिर्फ अपने घुटने टेक दिए हैं, बल्कि उन्होंने अपने चारों ओर अपनी तरफ से भी एक लक्ष्मण रेखा भी खींच दी है कि कोई सत्ता और शासन की निरंकुशता के संबंध में लिखे तो वो उनके लिए राष्ट्रद्रोही लगने लगता है I पत्रकारिता की आत्मा को सरकार की आत्मा में समाहित कर देने में मोदी सरकार सफल हो चुकि है I आज की पत्रकारिता समाज के बदले शासन और सत्ता का प्रतिनिधित्व करने की भूमिकाओं में आ गया है Iदिव्य रश्मि केवल समाचार पोर्टल ही नहीं समाज का दर्पण है |www.divyarashmi.com


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