विनय मिश्र
क्रांति को खुराक चाहीये.....
काल को आपका पाप चाहीये...
आपके दम्भ की परवाह.किसे....
धर्म को इंसाफ चाहीये ....।
अग्नि के सिंघासन पर......
फूलों का श्रृंगार ............
विक्राल रुप प्रदर्शीत होगा......
जब समुन्द्र करेगें चद्रमा से प्यार ..।
केवल आप समाज देश नहीं....
रुप अपना काल बदल रहा है.....
उठीये जागीये वक्त के साथ भागीये.....
समय अपना चाल बदल रहा है ..।
बन रहा है समय का विचित्र - चित्र....
हर मनुष्य निर्बल आवाक लाईये...
पाप से भरी धरती ......
यही तो क्रांति को खुराक चाहीये ...।
आज एक सफल प्रयोग को.....
आपके कृति का करार चाहीये...
आप क्या दे रहे है स्वविचार से....
क्रांति को खुराक चाहीये ..।।
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